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कुछ पुराने कपड़े क्या कर सकते हैं
anshu gupta

अन्य उद्यमी की तरह हैं, फिर भी सबसे अलग
अंशु गुप्ता किसी भी अन्य उद्यमी की तरह हैं जो समस्या को पहचान कर, उसका सही हल निकाल कर एक ऐसा उद्यम खड़ा करते हैं जो साल दर साल बढ़ता है। लेकिन इस उद्यम की एक बड़ी खासियत है और यह इस मायने में शानदार है की यह लाखों गरीब ग्रामीण लोगों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव ला रहा है।

अंशु के ग्राहक गरीब से गरीब लोग हैं। उनके पास पैसे हैं ही नहीं। लेकिन फिर भी वे अंशु के द्वारा बनायी गयी मूलभूत चीजें खरीदतें है। बदले में वे अंशु को देते हैं रुपये के बदले में अपना कौशल, अपनी मेहनत। और यह कौशल, यह मेहनत एक बार फिर उन्ही के जीवन, उनके गाँव में सकारात्मक बदलाव लाते  हैं। हैं न समाज पर शानदार असर डालने वाला बिज़नेस मॉडल। 

गूँज एक विचार है, एक आईडिया है
अंशु का कहना है कि गूँज एक विचार है, एक आईडिया है कि दूसरों की मदद करने की चाहत को किस प्रकार से एक ऐसा उद्यम बनाया जा सकता है जो अपने पैरों पर खड़ा है, जिसे बड़े उद्यम में बदला जा सकता है और जिसे हर कोई कर सकता है।

अंशु ने यह काम 13 साल पहले पत्नी के मिनाक्षी के साथ मिलकर स्वयं के 67 कपडें के साथ शुरू किया था।
उनके दिल्ली स्थित संगठन गूँज के देश के 21 राज्यों में 60  संग्रहण केंद्र हैं। 10 ऑफिस हैं और टीम में 150 साथी शामिल हैं। ये सभी मिलकर 250 से ज्यादा स्वयं सेवी संगठनों के साथ मिलकर हर महीने 80 से 100 टन कपडें गरीबों में बांटते हैं।

इस साल अंशु गुप्ता को सामाजिक उद्यमिता में स्वाब फाउंडेशन द्वारा वर्ष का श्रेष्ठ सामाजिक उद्यमी का पुरस्कार दिया गया है। उनके काम को अमेरिका की नासा एजेंसी ने गेम चेंजिंग इनोवेटर कहकर सलाम किया है। यह तो एक बानगी है। अवार्ड्स के सूची लम्बी है।

अंशु को बड़े-बड़े फोरम पर अपना वर्किंग मॉडल बदलने की सलाह दी जाती है। अंशु का कहना है की वे ऐसा क्यों करें। डोनेशन पर आधारित एनजीओ की तुलना में फेल होने वाली कम्पनीज की संख्या ज्यादा है। लोगो भरोसा करके दान देते हैं। हम इसी भावना का उपयोग सामाजिक विकास के लिए करना चाहते हैं। 

कपड़ा विकास की बहस में शामिल नहीं
कोई भी बिज़नेस लोगों की जरूरत को ध्यान में रखकर शुरू होता है। कपड़ा कभी भी विकास की बहस में शामिल नहीं किया जाता, जबकि यह मूलभूत जरूरत है। हम खाना, मकान, ऊर्जा, भेदभाव ढ़ेर सारी बातें करतें हैं। कोई भी कपडें को सबसे आवश्यक जरूरत के तौर पर नहीं देखता। जब हम गरीब लोगों को कपड़े देते हैं तो यह उनके विकास के लिए बहुत कीमती हो जाता है। अब वे अपने पैसों का उपयोग दूसरी अहम जरूरतों जैसे खाना, शिक्षा पर खर्च कर सकता है।

किसी भी अन्य उद्यम की तरह, अंशु लोगों को उनकी जरूरत की चीजें दे रहे हैं। जब लोग उन्हें दान में कपड़े या अन्य सामान देतें हैं तो लोग वह चीजें देतें हैं जो उनके काम की नहीं होती है। और जो इक्कठा किया जाता है वह गरीबों के लिए भी अनुपयोगी होता है। अंशु और उनकी टीम के लोग चीजों को छांटते हैं। उन्हें अच्छी तरह से साफ करतें है, मरम्मत करते हैं। काम के लायक तैयार करते हैं। और आवश्यकता अनुसार संस्कृति और रहन-सहन के आधार पर देश के अलग-अलग हिस्सों में भेज दिया जाता है।

goonj work

बेकार की चीजों से सामुदायिक, आर्थिक विकास
गरीब लोगों की सबसे बड़ी दौलत होती है उनका सम्मान। वे मर जायेंगे लेकिन भीख नहीं मांगेगे। अंशु इसका पूरा ध्यान रखते हैं। इसलिए अंशु लोगों को उनकी जरूरत की चीजें उनके द्वारा गाँव, समाज के लिए विकास के काम करने के बदलें में देते हैं। इस प्रकार अंशु, बहुत से लोगों द्वारा फेकी गयी बेकार की चीजों से सामुदायिक विकास, आर्थिक विकास का काम करते हैं। 

अंशु अब केवल कपड़े ही नहीं दे रहे हैं, वे स्कूल और ऑफिस के निर्माण के लिए मटेरियल भी दे रहे हैं। अंशु के ऑफिस में टेबल, कंप्यूटर, लैपटॉप, कागज, पेन, पेंसिल, किताबें या अन्य कोई भी चीज देखेगें तो पायेगे की ये सभी दूसरों के द्वारा दी गयी चीजें है, जिन्हें, बड़े जतन से उपयोग किया जा रहा है। कुछ की मरम्मत की गयी है तो किसी को रीसायकल किया गया है। 

पैसों की भी जरूरत है
गूँज को कपड़े और अन्य सामान एकत्रित करने, छाटने, साफ़ करने, फिर से उपयोग लायक बनाने और फिट देश के कोने-कोने में गरीबों तक पहुचने के लिए पैसों की जरूरत है। इसलिए गूँज आगे से सामान के साथ ही लाजिस्टिक के लिए 100 रूपये देना भी अनिवार्य करने जा रहा है। अभी गूँज का सालाना बजट है 3.5 करोड़ रूपये। इसका 40 फीसदी  व्यक्तिगत दानदाताओं, 50 फीसदी सामान और अन्य स्पॉन्सरशिप और 10 फीसदी  अवार्ड से प्राप्त राशि से आता है।

और अंत में
लोगों के व्यवहार और सोच में बदलाव लाना सबसे ज्यादा चुनौती वाला काम है। बहुत सारा पैसा विज्ञापन में खर्च किया जाता है, एक साधारण से बात सिखाने के लिए कि कचरा डस्टबिन में डालना चाहिए, लेकिन लोग इतनी छोटी सी चीज भी नहीं करते। 

अंशु लोगों के व्यवहार और सोच में बदलाव लाने की चुनौती से बखूबी निपट रहे हैं।  उन्हें और उनके जज्बे को सलाम।

(यह स्टोरी मूलतः नई दिल्ली के अर्जुन सेन ने अंग्रेजी में लिखी है और यह सिविल सोसाइटी ऑनलाइन वेबसाइट पर प्रकाशित है। इसका हिंदी अनुवाद करने की कोशिश की है हमने।  मूल स्टोरी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें )